मूल लेखक: तारादास बंदोपाध्याय

सुबह से ही आसमान में बादलों का डेरा था। दोपहर के ढलते ही मूसलाधार बारिश की एक तेज़ बौछार आई और चली गई। बारिश तो थम गई, पर आसमान अब भी घने, काले कजरारे बादलों से पटा हुआ था। एक ठंडी, सीलन भरी और बदन को कँपकँपा देने वाली हवा बह रही थी। ऐसे मौसम में मन के भीतर एक अजीब सी बेताबी और ‘क्या करें, क्या न करें’ की दुविधा जाग उठती है। दोस्तों से माँगकर कुछ विदेशी पत्रिकाएँ पढ़ने के लिए ला रखी थीं; मैंने उन्हें उलट-पलटकर देखा, पर इस बरसाती मौसम के मिजाज से उनका कोई मेल नहीं बैठ रहा था। फिर ख्याल आया, क्यों न पत्नी से ही बातें की जाएं? पर नहीं, शादी के सात साल बीत जाने के बाद ऐसी झमाझम बारिश में खिड़की के पास बैठकर पत्नी के साथ काव्यात्मक गुफ्तगू करना मुमकिन नहीं होता—यह सुनने में भले ही कितना भी बेरहम लगे, पर पूरी तरह सच था। महाकाल की इस असीम खामोशी और पुराने सुखद दिनों के बारे में मैं उदास मन से सोच ही रहा था कि अचानक दरवाजे पर कुंडी खटकी।

मैंने उठकर दरवाजा खोला तो सामने किशोरी सेन खड़ा था। अंदर आते हुए, कीचड़ से सने अपने रबर के जूते उतारते हुए वह मुस्कुराकर बोला, “ऐसी बारिश के दिन घर में बैठे-बैठे क्या कर रहे हो?”

मैंने कहा, “जो अब वजूद में नहीं है, उसी के मलबे से यादें बटोर रहा था। बहुत अच्छा हुआ कि तुम आ गए। बिल्कुल सही वक्त पर आए हो, क्यों?”

किशोरी बोला, “अब घर में दुबके रहने का कोई फायदा नहीं। बदन पर कोई शर्ट डाल लो। चलो, हम ज्योतिषी तारानाथ के घर हो आते हैं। कुछ नहीं तो उनके मुंह से दो-चार रहस्यमयी और अद्भुत किस्से ही सुनने को मिल जाएंगे! ऐसे ही माहौल में तो इन गूढ़ और अलौकिक कहानियों को सुनने का असली मजा आता है।”

तारानाथ का नाम सुनते ही मुझे हैरत हुई कि यह ख्याल पहले मेरे जेहन में क्यों नहीं आया? मैंने कहा, “बस दो मिनट रुको, मैं धोती बदल लेता हूँ।”

सड़क पर आने के बाद मैंने कहा, “ट्राम से जाने का कोई तुक नहीं है। महीने का आखिरी हफ्ता है, जेब में सिर्फ आठ पैसे बचे हैं। उससे बेहतर है कि पैदल ही चलें, सिगरेट खरीदी जा सकेगी। रास्ता ही कितना सा है!”

किशोरी की जेब का भी वही हाल था। आठ पैसे की ‘पासिंग शो’ सिगारेट खरीदकर, उसके कश खींचते हुए हम दोनों ‘मट लेन’ में स्थित तारानाथ के घर पर हाजिर हो गए।

दरवाजा तारानाथ की बेटी चारु ने खोला। मुझे देखते ही वह बोली, “चाचा, आज तो मेरी लेस (फीते) का डिजाइन नहीं भूले न? आप हर बार भूल जाते हैं।”

मैंने कहा, “आज नहीं भूला। पहले से ही जेब में संभालकर रखा था।” मैंने वह डिजाइन निकालकर उसके हाथ में दिया, तो चारु खुशी से मुस्कुराती हुई अंदर चली गई और बोली, “बैठिए, मैं बाबूजी को बुलाती हूँ।”

हमारे आने की खबर मिलते ही तारानाथ बड़े चाव से बाहर चले आए। आज के इस दौर में उनके जैसे किस्सागो को हमारे जैसे निष्ठावान और खामोशी से सुनने वाले श्रोता मिलना मुश्किल ही था। कहानी कहने वाला सच्चे श्रोता की कद्र बखूबी जानता है। तख्तपोश पर बैठते-बैठते तारानाथ बोले, “अरे वाह, आज अचानक रास्ता कैसे भूल गए?”

मैंने कहा, “घर में दिल नहीं लग रहा था, तो सोचा जरा आपके पास बैठकर गप्पें मार आएं। फिर, क्या कोई अच्छी सी कहानी सुनने को मिलेगी?”

तारानाथ मन ही मन खुश हुए। वे बोले, “बैठो, पहले इत्मीनान से सुस्ता लो। क्या खाओगे बताओ? ए चारु, चारु! जरा इधर सुनना…”

चारु बाहर आकर खड़ी हुई तो तारानाथ ने कहा, “जा, जल्दी से तेल, नमक और हरी मिर्च डालकर बढ़िया सूखे मुरमुरे (लाई) बनाकर ला। बाद में चाय देना।”

इसके बाद वे हमारी तरफ मुखातिब होकर बोले, “कौन सी कहानी सुननी है बताओ? तुम लोग तो इन सब बातों पर यकीन करते नहीं!”

किशोरी बोला, “ऐसा क्यों कहते हैं आप? अगर हमारा विश्वास न होता, तो इस बरसात में कीचड़ लांघते हुए इतनी दूर भला क्यों आते?”

तारानाथ हंसकर बोले, “वह तो सिर्फ कहानी सुनने का चस्का है! नास्तिक और अविश्वासी लोग ही परालौकिक कहानियों के सबसे बेहतरीन मुरीद होते हैं।”

मैंने कहा, “हम इतने दिनों से आपके पास आ रहे हैं, लेकिन आपने हमें कभी कोई अलौकिक शक्ति या चमत्कार नहीं दिखाया।”

तारानाथ ने अपनी तीखी निगाहों से मेरी तरफ देखा और बोले, “क्या मतलब? हवा में हाथ लहराकर जलेबी या रसगुल्ले लाकर दिखाऊं? या पानी पर फूंक मारकर उसका शरबत बना दूं? मैंने तुम्हें एक बार बताया था न, कि वे बेहद निचले दर्जे की सिद्धियां होती हैं—मेरे गुरु ने ऐसी बाजीगरी और ढोंग की सख्त मनाही की थी। फिर भी, जवानी में मैंने कुछ चीजें नहीं की थीं ऐसा नहीं है; लोगों को हैरान करने और पैसा कमाने के लिए मैंने कुछ तिकड़म किए थे, लेकिन उससे मेरी बची-कुची आध्यात्मिक ऊर्जा भी नष्ट हो गई। उसमें कोई सच्चा सुख नहीं है।”

इसी बीच चारु एक थाली में तेल-नमक सने मुरमुरे लेकर आई। उन्हें चबाते हुए मैंने पूछा, “क्या आपने कभी किसी हाड़-मांस के असली कापालिक साधु को देखा है?”

किशोरी ने पूछा, “तांत्रिक और कापालिक में क्या कोई फर्क होता है?”

तारानाथ बोले, “फर्क यकीनन होता है। पर वह तुम्हें समझाना मुश्किल है और उसे जानकर तुम्हें कुछ करना भी नहीं है। हां, मैंने कुछ कापालिक देखे हैं। लेकिन उनमें से एक कापालिक की याद मैं जिंदगी में कभी नहीं भूल सकता।” तारानाथ कुछ पलों के लिए अंतर्मुखी हो गए और सन्नाटे में डूब गए।

मैंने कहा, “सुनाइए न वह वाकया, सुनने में बड़ा कौतुक होगा।”

तारानाथ बोले, “सुनाता हूँ। पहले तुम लोग ये मुरमुरे खत्म कर लो…” चाय की चुस्कियां खत्म करने के बाद तारानाथ ने अपनी उस पुरानी याद का सिरा पकड़ा।

“बात कोई बीस-बाईस साल पुरानी है। तब मैं बीस-इक्कीस साल का अल्हड़ नवयुवक रहा हूँगा। मन में घर-बार छोड़कर संन्यासी बनने की तीव्र लालसा जागी थी। किसी को बिना बताए मैं घर से निकल भागा। अलग-अलग गांवों, जंगलों और मंदिरों में भटकता रहा। एक बार भटकते-भटकते मैं एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे पहुंचा। वहां एक साधु ने अपनी धुनी रमा रखी थी। उसका जिस्म कद्दावर था, सिर पर जटाएं थीं और आंखें खून की तरह सुर्ख लाल थीं। मैं वहां एक कोने में चुपचाप बैठ गया। कई तरह के लोग उस साधु के पास अपनी फरियादें और मन्नतें लेकर आ रहे थे और साधु मुस्कुराकर सबको रुखसत कर रहा था। यह सब निपटाते-निपटाते शाम ढल गई और घना अंधेरा छाने लगा। अब उस बरगद के नीचे सिर्फ मैं और वह साधु बचे थे।”

साधु ने पास पड़ी एक सूखी लकड़ी उठाकर धुनी में डाली और मेरी तरफ देखकर बोला, “आओ, आगे आकर बैठो।”

मैं साधु के सामने धुनी के दूसरी तरफ जाकर बैठ गया। धुनी के उजाल-अंधेरे प्रकाश में साधु कुछ देर मेरे चेहरे को एकटक निहारता रहा। फिर एक गहरी सांस छोड़ते हुए बोला, “संन्यासी बनने की चाह है न रे?”

मैं हक्का-बक्का होकर उसकी तरफ देखने लगा। साधु मुस्कुराया और बोला, “डर मत। तेरे माथे पर कठिन साधना के योग हैं। लेकिन तेरी पीठ पर एक खौफनाक साया मंडरा रहा है। साल भर के भीतर तेरी जान पर बन आ सकती है।”

मैंने चौंककर पीछे देखा, तो साधु हंसकर बोला, “तुझे वह दिखाई नहीं देगा, मुझे दिख रहा है।”

मैंने पूछा, “एक साल के भीतर ही संकट आएगा, यह आप किस बिना पर कह रहे हैं? वह पहले या बाद में भी तो आ सकता है?”

साधु ने कहा, “यह मैं अपने तजुर्बे से कह रहा हूँ। मेरा अंदाजा कभी गलत नहीं होता।”

मैं खामोश रहा। साधु के वे लफ्ज सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। अपनी पीठ के पीछे एक अदृश्य, स्याह अंधेरा मंडरा रहा है, यह जानकर भला किसे तसल्ली होगी? उस पर वह जगह बेहद वीरान थी—गांव के बाहर वह बरगद का पेड़ और पास ही फैली श्मशान भूमि।

मैंने साधू से गुहार लगाई, “महाराज, मुझे अपना शागिर्द बना लीजिए। मुझे साधना सिखाइए।”

साधु ने अपनी भृकुटियां तानकर कड़क आवाज में कहा, “यह मुमकिन नहीं है। मैं किसी को चेला नहीं बनाता। जिद मत कर — रफा-दफा हो यहाँ से!”

मैंने पूछा, “क्या मैं आपसे दोबारा कभी मिल पाऊँगा?”

साधु बोला, “यूं आसानी से तो मैं तुझे कभी नहीं मिलूंगा। लेकिन अगर कभी वाकई तेरी जान पर बन आई, तो मैं तुझे सचेत करने जरूर आऊंगा।” इतना कहकर उसने धुनी से एक अधजली लकड़ी उठाई और धुनी को कुरेदते हुए चिल्लाया, “जा, जा, भाग यहाँ से!”

मैं खौफ के मारे घर लौट आया। दूसरे ही दिन वह साधु अपनी धुनी समेटकर कहीं चला गया। मैं शाम को उस बरगद के पास गया, तो वहां सिर्फ धुनी की ठंडी राख और कोयला बचा था।

इसके बाद करीब नौ-दस महीने बीत गए। मैं घर पर ही था। एक दिन मैं अपने दोस्त हरमोहन बाबू के साथ किसी काम से पास के गांव गया था। वहां हमारा काम निबटने में काफी वक्त लग गया और रात घिर आई। हरमोहन बाबू बोले कि रात के वक्त इस जंगली रास्ते से जाना खतरों से खाली नहीं है, इसलिए आज रात इसी गांव में कहीं ठिकाना ढूंढ लेते हैं। हम गांव के एक बड़े मकान के पास पहुंचे। वह घर एक समृद्ध किसान का था। हमने बाहर से ही आवाज दी। एक अधेड़ उम्र के सज्जन ने दरवाजा खोला। हम ब्राह्मण हैं यह जानते ही उन्होंने हमारा सहर्ष स्वागत किया। उनका नाम माधव घोष था। उनके पास करीब पचास बीघा खेती थी। माधव घोष ने हमारे ठहरने और भोजन का उत्तम प्रबंध किया। रात को भोजन के बाद हम उनके ओसारे (दहलीज) में बैठे थे। माधव घोष ने हमें हुक्का लाकर दिया और खुद सामने बैठकर बातें करने लगे।

बातों-बातों में मैंने कहा, “माधव बाबू, आपके गांव के लोगों की मेहमाननवाज़ी वाकई काबिले-तारीफ है। हम अजनबी हैं, फिर भी आप हमारी इतनी फिक्र कर रहे हैं, इसमें आपका क्या नफा है?”

माधव घोष ने दांतों तले उंगली दबाई और बोले, “ऐसा पाप मत बोलिए ठाकुर महाशय! आप ब्राह्मण हैं, आपके चरणों की धूल हमारे घर में पड़ी, यह हमारा अहोभाग्य है। लेकिन कुछ दिनों पहले ऐसी ही एक रात मेरे हाथों एक भारी भूल हो गई, जिसका पछतावा मुझे आज भी खाए जा रहा है।”

मैंने पूछा, “ऐसी क्या खता हो गई आपसे?”

माधव घोष उदास होकर कहने लगे, “तकरीबन पंद्रह-बीस दिन पहले एक साधु हमारे गांव आया था। वह श्मशान में डेरा डाले हुए था। एक दिन वह मेरे द्वार पर आया। उसका हुलिया बेहद डरावना और अघोरी था। उसने मेरी तरफ देखा और मेरी बड़ी बेटी को मांग बैठा! वह कहने लगा कि उसे अपनी तांत्रिक साधना के लिए एक कुंवारी कन्या की जरूरत है और इसके शरीर के सारे लक्षण सर्वोत्तम हैं। यह सुनते ही मेरा खून उबल पड़ा। मैंने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई और गांव वालों को इकट्ठा कर लिया। मैंने उससे कहा कि तू साधु के भेष में ढोंगी है, दफा हो जा यहाँ से! गांव वालों ने उसे पीटकर खदेड़ दिया। जाते-जाते उस साधु ने मेरी तरफ बेहद खूंखार नजरों से देखा और कहा, ‘तूने बहुत बड़ी भूल कर दी। तेरी बेटी का उद्धार होने वाला था। अब इस कर्म का फल तुझे जल्द ही भुगतना पड़ेगा!’ वह तो चला गया, पर तब से मन में एक अनजाना सा डर बैठ गया है।”

मैं माधव घोष की बात सुनकर सन्न रह गया। मैंने कहा, “यह तो बेहद खौफनाक बात है। वह साधु दोबारा गांव में नहीं दिखा क्या?”

माधव घोष बोले, “नहीं, दोबारा उसकी इधर आने की जुर्रत नहीं हुई। लेकिन तब से हमारे घर में कुछ अजीब-ओ-गरीब घट रहा है ऐसा महसूस होता है।”

उस रात हम वहीं सोए। अगले दिन सुबह हम अपने गांव लौट आए। लेकिन माधव घोष की उस दास्तान ने मेरे भीतर एक बेचैनी पैदा कर दी थी। मुझे बार-बार उस श्मशान की और उस अघोरी साधु की याद आ रही थी। कुछ दिनों बाद मैंने तय किया कि मुझे खुद वहां जाकर देखना चाहिए कि माजरा क्या है। मैं दोबारा उस गांव गया और शाम के ढलते ही गांव के बाहर मौजूद उस वीरान श्मशान में जा पहुंचा।

श्मशान में चारों तरफ मरघटी सन्नाटा पसरा था। पुरानी चिताओं की राख और हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। मैं वहां खड़ा होकर आसपास का मुआयना कर ही रहा था कि अचानक मेरी पीठ के पीछे से एक बेहद गंभीर और भारी आवाज गूंजी— “यहाँ क्या ढूंढ रहा है?”

वह आवाज इतनी डरावनी और धातु जैसी कडक थी, मानो लोहे के बर्तन में पत्थर के टुकड़े डाल दिए गए हों! मैंने चौंककर पीछे देखा, तो सामने एक साधु खड़ा था। सिर पर पकी हुई इमली जैसे सफेद-काले जटाओं का अंबार, बदन पर सिर्फ एक लंगोट और आंखों में एक अलौकिक चमक थी। पर गौर से देखने पर मेरे होश उड़ गए—यह तो वही साधु था जिसने नौ महीने पहले मुझे बरगद के पेड़ के नीचे आगाह किया था!

मैंने फौरन उसके चरणों में सिर नवा दिया। साधु ने मुझे उठाया और मुस्कुराकर बोला, “आखिरकार तू आ ही गया! मैंने तुझसे कहा था न कि मुसीबत के वक्त मैं तुझे सचेत करने आऊंगा। आज वही रात है।”

साधु मुझे अपनी छोटी सी कुटिया में ले गया। उसने अंदर से दो पके हुए केले लाकर मुझे खाने को दिए। मैंने उन्हें चुपचाप खा लिया। साधु ने मुझसे पूछा, “घर से संन्यासी बनने क्यों निकला था? मेरे साथ रहोगे? मैं तुझे अपना चेला बना लूंगा।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। साधु ने आगे कहा, “तेरे माथे पर उच्च साधना के योग हैं, लेकिन तेरे पूर्वकर्मों का एक बड़ा संकट तुझ पर हावी होने जा रहा है। आज रात इस श्मशान में एक भयानक शक्ति का खेल होने वाला है। वह खेल तुझे देखना होगा।”

इसके बाद साधु ने मुझे अपनी कुटिया के बाहर बैठने को कहा। वह खुद अंदर कुछ तैयारी करने लगा। शाम ढलकर रात का स्याह अंधेरा गहरा गया। साधु ने जंगल से एक जिंदा गौरैया (चिडिया) पकड़ रखी थी। उसने मेरे सामने एक तेज छुरी ली और उस चिड़िया का पेट चीरकर उसकी अंतड़ियां बाहर निकाल दीं! उसके बाद उसने एक छोटी, अज्ञात वस्तु उस मृत चिड़िया के पेट में ठूंस दी। उसने मिट्टी के दो छोटे कुल्हड़ (मटके) मंगाए। एक कुल्हड़ में उस मृत चिड़िया को रखकर ऊपर से दूसरा कुल्हड़ औंधा रख दिया। फिर गुंधे हुए आटे से उन दोनों कुल्हड़ों के जोड़ को अच्छी तरह सील कर दिया। मैंने कौतूहल से पूछा, “महाराज, इससे क्या होगा?”

साधु ने संक्षेप में कहा, “वक्त आने पर जान जाओगे।” उसने वह बंद कुल्हड़ मेरे हाथ में थमाया और कहा, “इसे सामने धधकती धुनी की आग पर रख दे और जब तक मैं न कहूं, इसे वहां से हटाना मत।” मैंने वैसा ही किया।

करीब एक घंटे बाद कुल्हड़ के भीतर से अचानक फड़फड़ाहट की आवाज आने लगी! मानो अंदर कोई जिंदा पक्षी पंख मार रहा हो। साधु बोला, “अब उस कुल्हड़ को आग से बाहर निकाल और उसका मुंह खोल।” मैंने आटे की सील तोड़ी और ऊपर का कुल्हड़ हटाया, तो क्या देखता हूँ! वह चीरी हुई चिड़िया पूरी तरह जिंदा होकर कुल्हड़ से बाहर उड़ी और अंधेरे आसमान में कहीं ओझल हो गई! यह मंजर देखकर मेरे बदन में कंपकंपी छूट गई। मरे हुए पंछी को जिंदा करने की यह तिलस्मी विद्या देखकर मैं भौंचक्का रह गया था।

साधु बोला, “यह तो महज़ एक बानगी है। मूल विद्या इससे कहीं जुदा और खौफनाक है। अब मैं तुझे असली बात बताता हूँ।”

साधु ने सामने बैठकर मुझे बताया, “मैंने तुझे कुछ दिनों पहले माधव घोष के घर के बारे में बताया था न? वह कापालिक साधु जिसने माधव घोष की बेटी को मांगा था, वह कोई और नहीं बल्कि मेरा ही एक गुरुभाई है। उसका नाम उग्रानंद है। वह बेहद बेरहम और वाममार्गी कापालिक है। उसे अपनी वेताल सिद्धि के लिए एक खास लक्षणों वाली लड़की की बलि की दरकार है। माधव घोष की बड़ी बेटी के शरीर पर वे सारे लक्षण मौजूद हैं। माधव घोष ने उसे दुत्कार कर भगा दिया, इसलिए उग्रानंद अब प्रतिशोध की आग में जल रहा है। उसने उस लड़की की जान लेने और उसे अपने वश में करने के लिए एक भयानक ‘अभिचार कर्म’ (काला जादू) शुरू किया है। आज रात वह अपनी सिद्धि मुकम्मल करने वाला है और उस लड़की की मौत तय है।”

यह सुनकर मेरा कलेजा कांप उठा। मैंने कहा, “महाराज, फिर क्या उस मासूम बच्ची को बचाने का कोई जरिया नहीं है?”

साधु की आंखें गुस्से से लाल हो उठीं। वह बोला, “उपाय है, इसीलिए तो मैंने तुझे यहाँ तलब किया है। उग्रानंद ने एक अत्यंत दुष्ट वेताल को जगाया है। वह वेताल आज रात माधव घोष के घर पर कहर बरपाने वाला है। पर कापालिक का नियम यह है कि अगर वेताल को उसके मकसद से रोक दिया जाए, तो वह पलटकर उसी को अपना ग्रास बनाता है जिसने उसे जगाया है! आज रात हमें उस वेताल का रास्ता रोकना है। उग्रानंद का खात्मा ही उसका न्याय होगा।”

साधु ने मुझे फौरन माधव घोष के घर जाने का हुक्म दिया। उसने मुझे अभिमंत्रित जल एक पात्र में दिया और कहा, “यह पानी लेकर जा। रात के वक्त माधव घोष के घर के चारों तरफ यह पानी छिड़ककर एक सुरक्षा कवच (लक्ष्मण रेखा) बना दे। घर से बाहर किसी को पैर मत रखने देना। अगर वेताल घर में दाखिल नहीं हो पाया, तो वह उलटे पैर लौटकर उग्रानंद का शिकार कर देगा। जा, वक्त बहुत कम है!”

मैं उसी रात दौड़ता-भागता माधव घोष के गांव पहुंचा। रात के करीब ग्यारह बज रहे होंगे। मैंने माधव घोष के घर का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने किवाड़ खोले, तो मेरा बदहवास चेहरा देखकर वे ठिठक गए। मैंने उन्हें कुछ भी बताए बिना फौरन वह अभिमंत्रित जल लिया और उनके घर के चारों ओर जमीन पर छिड़कते हुए एक दायरा खींच दिया। मैंने माधव घोष से कड़े लहजे में कहा, “माधव बाबू, आज की रात आपके परिवार के लिए कयामत की रात है। घर का कोई भी जी, चाहे कुछ भी हो जाए, इस रात चौखट के बाहर कदम नहीं रखेगा। अंदर बैठकर ईश्वर का नाम जपिए!”

माधव बाबू सिहर उठे, पर मेरी आवाज की गंभीरता को भांपकर उन्होंने अपने कुनबे को अंदर के कमरे में बंद कर लिया। मैं खुद ओसारे में एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गया। रात और स्याह होती चली गई।

ठीक आधी रात बीतने पर अचानक फिजां में एक खौफनाक तब्दीली आई। बाहर मौजूद आम के बगीचे के दरख्त एकाएक जोरों से झूमने लगे। कोई हवा नहीं चल रही थी, न ही तूफान के दिन थे, फिर भी वे पेड़ मानो जड़ से उखड़ जाएंगे इस रफ्तार से डोल रहे थे। घर की खिड़कियां और दरवाजे अपने आप धड़ाम-धड़ाम बजने लगे। अंदर से औरतों के रोने और चीखने की आवाजें आने लगीं। मैंने पागलों की तरह चिल्लाकर कहा, “कोई बाहर मत आना! अंदर ही रहो!”

इसी बीच उस बवंडर के शोर को चीरती हुई एक बेहद घिनौनी, अमानवीय और रोंगटे खड़े कर देने वाली चीख सुनाई दी! वह आवाज किसी इंसान की नहीं थी, बल्कि किसी आदमखोर दरिंदे की विकृत दहाड़ जैसी थी। घर की खपरैल छत पर कुछ बहुत भारी चीज गिरने की ‘धप’ से आवाज हुई। ऐसा महसूस हो रहा था कि कोई विशालकाय जीव छत पर दौड़ रहा है। इसके बाद घर के मुख्य दरवाजे पर भारी प्रहार होने लगे — ‘धाड़! धाड़! धाड़!’

दरवाजा कांप रहा था, पर साधु के दिए उस अभिमंत्रित जल के सुरक्षा चक्र की वजह से वह अनदेखी खौफनाक ताकत घर के भीतर दाखिल नहीं हो पा रही थी। वह वेताल बाहर से ही अट्टहास और गर्जना कर रहा था। उसकी वह वहशी आवाज सुनकर मेरे दिल की धड़कन रुकने को थी। मैं मन ही मन उस बरगद वाले साधु का सिमरन कर रहा था।

यह दहशत का तांडव तकरीबन आधे घंटे तक चलता रहा। वह वेताल घर के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहा था, सुरक्षा कवच को भेदने की नाकाम कोशिश कर रहा था। आखिरकार, एक खौफनाक और चीरने वाली चीख के साथ वह आवाज धीरे-धीरे घर से दूर जंगल की तरफ लौट गई। आम का बगीचा शांत हो गया, बवंडर थम गया और पूरे इलाके में फिर से वही रहस्यमयी सन्नाटा पसर गया।

अगली सुबह गांव में एक सनसनीखेज खबर फैली। जंगल के उस पार ‘विरामखाली’ नाम के श्मशान में एक कापालिक साधु की बेहद दर्दनाक और अमानवीय तरीके से मौत हो गई थी। गांव वाले और पुलिस उधर दौड़े। मैं भी कौतूहलवश लोगों के हुजूम के साथ वहां गया।

श्मशान में उग्रानंद कापालिक का शव खून से लथपथ पड़ा था। वह मंजर इतना वीभत्स था कि कमजोर दिल वाले लोग देखकर उल्टियां कर रहे थे। उसका सिर धड़ से पूरी तरह मरोड़कर पीछे की तरफ घुमा दिया गया था! मानो किसी महाबली ने उसका सिर पकड़कर गोल घुमा दिया हो। उसकी आंखें फटी की फटी रह गई थीं और चेहरे पर असहनीय दर्द और दहशत के भाव जमे हुए थे। वहां खड़े एक सिपाही ने कहा, “किसी दुश्मन ने रात के वक्त इसका बेरहमी से कत्ल किया है। यह किसी इंसान का काम नहीं लगता।”

मैं मन ही मन सारा माजरा समझ चुका था। उस बरगद के पेड़ वाले साधु ने मुझसे कहा था— ‘अगर वेताल को सुरक्षा कवच के कारण बलि नहीं मिली, तो वह पलटकर उसी की जान ले लेगा जिसने उसे जगाया है!’ उग्रानंद अपनी ही तंत्रविद्या और वेताल के कोप का शिकार हो चुका था। मासूम बच्ची की जान बच गई थी और उग्रानंद को उसके पापों की सजा मिल चुकी थी।

मैंने मन ही मन उस महान साधु और उस अदृश्य सत्ता को प्रणाम किया, जिसने मुझे जरिया बनाकर इस विपदा से उबारा था और मेरी पीठ पर मंडराते उस काल के साए को हमेशा के लिए दफन कर दिया था।

कहानी खत्म कर तारानाथ ने चाय की आखिरी चुस्की ली और हमारी तरफ देखते हुए पूछा, “तो फिर, कैसी लगी यह पहली कहानी?”

हम दोनों अवाक थे। किशोरी के मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे। हमने कहा, “बेहद अद्भूत और रोंगटे खड़े कर देने वाला वाकया!”

सड़क पर वापस लौटते हुए मैंने किशोरी से हंसकर पूछा, “अब तो यकीन हो गया न भाई?”

किशोरी ने उस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया, वह बस रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराया और बोला, “विश्वास हो या न हो, पर आज का यह बरसाती दिन बेहद हसीन और कामयाब रहा, क्यों?”

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