तारानाथ तांत्रिक: दूसरी कहानी (रामदुलाल मित्रा का मकान और अतृप्त आत्मा)

मूल लेखक: तारादास बंदोपाध्याय

शाम का वक्त था। तारानाथ के बैठक वाले कमरे में हमेशा की तरह गपशप की महफ़िल खूब जमी हुई थी। रोज़-रोज़ तारानाथ के घर आकर मुफ्त की चाय और कहानियों का लुत्फ़ उठाना ठीक नहीं, ऐसा समझदारी भरा विचार करके आज मैं और किशोरी चौराहे की ‘तलेभाजा’ (भजिया-वड़े) की दुकान से गरमागरम बैंगन के पकोड़े (बेगुनी) और फुलुरी खरीद लाए थे। अब खाने के बाद कमरे में बस शाल के पत्तों पर तेल के दाग बचे रह गए थे। इतने में अंदर से दूसरी बार खौलती हुई चाय भी हाजिर हो गई।
चाय की एक संतोषभरी चुस्की लेते हुए तारानाथ बोले, “कुछ भी कहो, पर वो ओड़िया दुकानदार वाकई लाजवाब पकोड़े बनाता है, मानते हो कि नहीं?”
किशोरी ने मुस्कुराकर कहा, “हर चीज़ का स्वाद इंसान के मन की स्थिति पर निर्भर करता है तारानाथ बाबू। आज आपको कोई काम नहीं है, मन बिल्कुल शांत और बेफिक्र है; ऐसे समय में बासी पकोड़े या दाल के ठंडे वड़े भी स्वादिष्ट लगेंगे! लेकिन यही अगर सिर पर चिंताओं के बादल मंडरा रहे हों, तो देहरादून के खुशबूदार चावल की बिरयानी भी गले के नीचे नहीं उतरेगी, सच है कि नहीं?”
तारानाथ ने मंद मुस्कान बिखेरी और चाय का कप होठों से लगाते हुए बोले, “तुम्हारी यह बात तुम जैसे सुरक्षित, आम ज़िंदगी जीने वाले लोगों के लिए भले ही सच हो, लेकिन मेरे मामले में यह पूरी तरह लागू नहीं होती। तुम्हारे लिए चिंता एक असामान्य बात है, पर मैं रात को कोई भयानक घटना घटने वाली है यह जानते हुए भी दोपहर में तृप्ति से भरपेट खाना खा सकता हूँ, मैंने अपने मन को इतना फौलादी बना लिया है।”
चाय के दो-तीन घूंट लेकर कप नीचे रखते हुए, मानो पुरानी यादों की दुनिया में कदम रख रहे हों, वे आगे बोले, “खाने से याद आया, खाने का ज़िक्र छिड़ते ही मुझे हमेशा रामदुलाल मित्रा की याद आती है। उनके घर मेहमान बनकर रहकर मैंने कुछ दिन जो खातिरदारी और पकवानों का आनंद लिया, वैसा भोजन अमूमन किसी के नसीब में आसानी से नहीं होता।”
किशोरी ने उत्सुकता से पूछा, “क्या आप उनके यहाँ घूमने गए थे?”
तारानाथ बोले, “अरे छोड़ो! मेरा और घूमने का क्या वास्ता? मैं वहाँ एक बेहद ज़रूरी काम से गया था। वे एक बड़ी मुसीबत में फँस गए थे और उन्होंने मुझे मदद के लिए बुलाया था। वह एक लंबा इतिहास है।”
मैंने कहा, “तो फिर हो जाए वही कहानी! सुनने में बड़ा मज़ा आएगा।” तारानाथ ने अपनी यादों को थोड़ा समेटा और सुनाना शुरू किया।
“बात तकरीबन बीस साल पुरानी है। मधुसुंदरी देवी का वह खौफनाक मामला सुलझ चुका था और मैं घर पर बैठकर शांति से गृहस्थी चला रहा था। घर का खर्च चलाने के लिए मैं लोगों के हाथ देखता था, नवग्रह के कवच बनाकर देता था और चेहरा देखकर भविष्य बताता था। पैसों की आमदनी अच्छी-खासी थी, पर खर्च भी उतना ही था; इसलिए ज़िंदगी में कभी पैसों की कोई बड़ी पूंजी जमा नहीं कर पाया। मेरी देवी ने पहले ही कह रखा था कि—तुझे अन्न की कभी कमी नहीं होगी, पर तू कभी बहुत बड़ा अमीर धनवान भी नहीं बन पाएगा।”
“एक दिन सुबह मैं अपनी बैठक में बैठा था, इतने में एक अधेड़ उम्र के सज्जन कमरे में दाखिल हुए। काले-सफेद बाल, तंदुरुस्त और गठीला बदन, बदन पर महंगी महीन धोती, रेशमी कुर्ता और उस पर सोने के बटन चमक रहे थे। दाहिने हाथ की उंगलियों में कई कीमती रत्नों की अंगूठियां थीं। उनके पूरे व्यक्तित्व पर रईसी और एक कामयाब बिजनेसमैन की छाप साफ दिखाई दे रही थी।”
उन सज्जन ने मुझसे अदब से पूछा, “क्या आप ही ज्योतिषी तारानाथ बाबू हैं?”
मैंने कहा, “जी हाँ, मैं ही हूँ। कहिए, क्या काम है?”
उन सज्जन ने आगे बढ़कर मेरे पैर छूकर प्रणाम किया और बोले, “आपका तेज देखकर मैंने पहले ही पहचान लिया था। मेरा नाम रामदुलाल मित्रा है। कलकत्ता के बड़ाबाज़ार इलाके में मेरा छोटा-मोटा कारोबार है। आप जैसे साधुओं के आशीर्वाद से अन्न-वस्त्र की कोई कमी नहीं है, भरपूर सुख है। लेकिन हाल ही में मैं एक बड़ी मुसीबत में फँस गया हूँ और इसीलिए आपके पास आया हूँ। पर ठाकुर महाशय, मेरी मुसीबत क्या है यह मैं खुद नहीं बताऊंगा! मैंने सुना है कि आप इंसान का चेहरा देखकर उसका भूत, भविष्य और वर्तमान बिल्कुल सटीक बता सकते हैं। तो आप ही बताइए भला, मुझ पर क्या आफ़त आई है? बुरा मत मानिएगा, लेकिन मैं सही इंसान के पास आया हूँ या नहीं, यह मुझे पहले परखना है।”
व्यापारी की साफ-सुथरी भाषा थी वह! मैं मन ही मन मुस्कुराया। यह आदमी जैसे ही कमरे में आया था, मुझे तभी पता चल गया था कि यह किस मुसीबत में फँसकर यहाँ आया है। पर लोगों को चमत्कार का झांसा देकर हैरान करने की मेरी आदत नहीं थी; मैं उसी के मुंह से सब उगलवाना चाहता था। लेकिन जब वह मेरी परीक्षा लेना ही चाह रहा था, तो मुझे भी जवाब देने में क्या हर्ज़ था?
मैंने इत्मीनान से कहा, “मित्रा बाबू, इस समय आप पर एक साथ तीन बड़ी मुसीबतें आई हुई दिखाई दे रही हैं। पहली मुसीबत यह है कि आपके चलते हुए कारोबार को अचानक एक बड़ा झटका लगा है, व्यापार में भारी मंदी आ गई है, सही कहा ना?”
रामदुलाल मित्रा ने आँखें बड़ी करते हुए कहा, “बिल्कुल सच! और दूसरी?”
मैंने कहा, “उस पहली मुसीबत की फिक्र मत कीजिए। मैं यहीं बैठे-बैठे कहता हूँ—आप नीले रंग के गणपति की मूर्ति लाकर उसकी स्थापना कीजिए और पूजा कीजिए, आपके व्यापार के दिन फिर से पलट जाएंगे। अब दूसरी मुसीबत सुनिए: आपके ऊपर इस समय एक भयानक वास्तु दोष या रहने के मकान से जुड़ी कोई बड़ी पेचीदगी खड़ी हो गई है, जिस मकान में आप रह नहीं पा रहे हैं।”
रामदुलाल मित्रा ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और बोले, “धन्य हैं आप ठाकुर! मैंने तंत्रविद्या के बारे में सिर्फ सुना था, आज खुद अपनी आँखों से देख लिया। लेकिन मुझे बताइए, तीसरी मुसीबत कौन सी है?”
मैंने कहा, “तीसरी मुसीबत मैं बताऊँ? उसे आप खुद ही सुलझा सकते हैं, उसके लिए मेरी मदद की ज़रूरत नहीं है। आपने एक शख्स को नियमित रूप से जो मोटी रकम गुपचुप तरीके से देनी शुरू की है, वह देना फौरन बंद कर दीजिए। पछतावा और पश्चाताप होने पर पाप का नाश हो जाता है। आपके घर में लक्ष्मी का वास है ना?”
रामदुलाल मित्रा ने अपना सिर नीचे झुका लिया, उनका चेहरा शर्म और पछतावे से भर गया था। वे बोले, “क्या बताऊँ ठाकुर महाशय, इंसान की मति मारी जाती है। मुझसे अतीत में एक बड़ा अपराध हुआ है, अब उसका प्रायश्चित तो मुझे करना ही होगा। पाप इंसान को छोड़ता नहीं है। हाँ, मेरे घर में मेरी पत्नी और बच्चे हैं।”
मैंने कहा, “उनके साथ ही आपको सुखी रहना होगा। मन ही मन ईश्वर और परिवार से माफ़ी मांगिए। अब मुझे अपनी उस मकान की मुसीबत के बारे में तफ़सील से बताइए।”
रामदुलाल मित्रा बताने लगे, “ठाकुर महाशय, मैं बचपन में बेहद गरीबी और तंगहाली में पला-बढ़ा। मेरे माता-पिता मेरे बचपन में ही गुज़र गए थे। मैंने कलकत्ता के बाज़ार में कुली का काम किया, सिर पर बोझ ढोया, एक-एक पैसा बचाकर धीरे-धीरे कपड़े का कारोबार शुरू किया। शुरुआती दिनों में रहने के लिए जगह नहीं थी, कई रातें मैंने फुटपाथ पर खुले आसमान के नीचे गुज़ारी हैं। आज मेरे पास कलकत्ता में भरपूर पैसा होने के बावजूद खुद का मकान नहीं है, मैं एक बड़े किराए के मकान में रहता हूँ। मकान खरीदने की मेरी हैसियत है, लेकिन कलकत्ता की इस भीड़भाड़ में मुझे अपना घर बनाने की इच्छा नहीं थी। मैं मूल रूप से गाँव का आदमी हूँ, इसलिए ज़िंदगी के आखिरी दिन बच्चों पर कारोबार सौंपकर गाँव में शांति से गुज़ारूँ, ऐसी मेरी तीव्र इच्छा थी।”
“तकरीबन पिछले साल के आखिर में एक दलाल ने मुझे एक बढ़िया खबर ला कर दी। राजबलहाट के पास स्थित ‘मतीपुर’ नाम के गाँव में एक पुरानी लेकिन बेहद आलीशान और विशाल हवेली बिकने वाली है। वह वहाँ के पुराने जमींदारों की हवेली थी। जमींदार चल बसे थे और उनके बच्चों को गाँव की जायदाद बेचकर कलकत्ता में हमेशा के लिए बसना था। हवेली थोड़ी पुरानी ज़रूर थी, पर मामूली मरम्मत कराने के बाद वह बिल्कुल राजमहल जैसी दिखती। उन लड़कों ने बेहद मामूली कीमत पर उसे बेचने निकाला था। मैंने दलाल के ज़रिए अच्छा सौदा करके वह बड़ी हवेली खरीद ली। कई सपने संजोकर मैंने वह घर खरीदा था ठाकुर, लेकिन अब उस घर में रहना हमारे लिए बिल्कुल नामुमकिन हो गया है!”
मैंने पूछा, “पर ऐसा क्या हो गया उस घर में?”
रामदुलाल बाबू कांपती आवाज़ में बोले, “ठाकुर, उस मकान पर किसी भयानक बुरी आत्मा या प्रेत का साया है! हवेली खरीदने के बाद हम पूरा परिवार कुछ दिन वहाँ रहने के लिए गए थे। पहली ही रात मेरी पत्नी कुछ देखकर डर के मारे ज़ोर से चीख पड़ी। उसके मुताबिक, कमरे की खिड़की के बाहर अंधेरे में एक इंसानी साया, किसी औरत की काली परछाई खड़ी थी। अचरज की बात यह है कि वह कमरा पहली मंज़िल पर था और उस खिड़की के बाहर पैर रखने के लिए कोई छज्जा या छत नहीं थी! फिर वहाँ कौन खड़ा रह सकता है? चोर-डकैत तो वहाँ पहुँच ही नहीं सकते थे।”
“उसके दूसरे दिन शाम के वक्त मेरा बड़ा बेटा, शचीदुलाल घर के पिछले हिस्से में गया था। कुछ देर बाद वह बेहद घबराया हुआ वापस लौटा और बोला—’बाबूजी, घर की बाहरी दीवार के पास बैठकर कोई ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है! वह किसी औरत की आवाज़ है।’ हमें शक हुआ तो मैं फौरन नौकरों को लेकर हाथ में लालटेन थामे बाहर गया। पिछला आंगन पार करके बाहर एक बड़ी चहारदीवारी है, जिसके पार घनी झाड़ियां, बेलें और घना जंगल है। ऐसे उजाड़ सन्नाटे में इस ढलती शाम को कौन औरत रोने बैठेगी? हम वहाँ गए तो वहाँ कोई नहीं था। लेकिन ठाकुर महाशय, जब हम वापस मुड़ रहे थे, तभी अचानक मेरे कानों में बिल्कुल साफ आवाज़ आई—कोई बेहद व्याकुल होकर, सिसकियाँ ले-लेकर रो रहा था! वह किसी जवान लड़की की, औरत की ही आवाज़ थी! बेहद दर्दनाक था वह रोना। हमने दोबारा पीछे जाकर देखा, तो वहाँ कुछ नहीं था। बाद में मुझे अहसास हुआ कि वह रोने की आवाज़ हवेली के बाहर से नहीं, बल्कि सीधे घर की ज़मीन के नीचे से या दीवारों में से आ रही थी! हमारे मन में एक अंजाना खौफ बैठ गया। यह कोई आम लक्षण नहीं था।”
“दूसरे ही दिन मैंने अपनी पत्नी और छोटे बेटे को कलकत्ता वापस भेज दिया। मैं और मेरा बड़ा बेटा शची दो दिन और वहाँ रुके। उन दो दिनों में हर रोज़ शाम होते ही वह अमानवीय रोना हमारे कानों में पड़ता था। और क्या बताऊँ ठाकुर, जब तक हम उस हवेली के अंदर रहते हैं, तब तक हमारा मन बेहद उदास, खिन्न और बेचैन हो जाता है। मानो छाती पर किसी ने बड़ा पहाड़ लाकर रख दिया हो, ऐसा भारीपन महसूस होता है। वह मकान ठीक नहीं है ठाकुर। पर मैंने अपनी ज़िंदगी भर की गाढ़ी कमाई लगाकर उसे खरीदा है; अगर हमने वहाँ जाना बंद कर दिया तो वह हवेली भूतबंगला बन जाएगी। इस पर कोई उपाय निकालिए, मुझे बचाइए!”
मैंने थोड़ा विचार किया और कहा, “मित्रा बाबू, क्या आप मुझे एक बार खुद वहाँ ले जा सकते हैं?”
रामदुलाल बाबू खुशी से चहक उठे, “हाँ, क्यों नहीं! मुझे मालूम था कि आप वहाँ आने के लिए ज़रूर तैयार हो जाएंगे। आपके आने-जाने का, रहने और खाने का सारा खर्च मैं उठाऊंगा और अपनी हैसियत के मुताबिक आपको उत्तम दक्षिणा भी दूंगा। हम कब निकलना है, बताइए?”
मैंने कहा, “परसों सुबह तैयार रहिएगा। हम निकलेंगे।”
कलकत्ता से दूर, राजबलहाट से तकरीबन तीन मील की दूरी पर ‘मतीपुर’ नाम का वह गाँव था। हम दोपहर के करीब तीन बजे वहाँ पहुँचे। गाँव बेहद छोटा और शांत था, लेकिन वह जमींदारों की हवेली वाकई देखने लायक और विशाल थी। दो मंज़िला इमारत, बाहर का बड़ा बरामदा, अंदर के आलीशान दालान और चारों तरफ खड़े बड़े-बड़े खंभे। हवेली में कुल मिलाकर तेईस से चौबीस छोटे-बड़े कमरे थे। आस-पास कोई दूसरी इंसानी बस्ती नहीं थी; मुख्य गाँव वहाँ से थोड़ा फासले पर था।
रामदुलाल बाबू और उनके बेटे ने मेरा बड़े आदर के साथ स्वागत किया और मुझे अंदर के एक बड़े कमरे में ले गए। लेकिन दोस्तों, सच बताता हूँ, उस हवेली की मुख्य दहलीज़ पर कदम रखते ही मुझे तुरंत इस बात का अहसास हो गया कि—इस मकान में यकीनन कोई भयानक गड़बड़ी है! असल में क्या है, यह मैं शब्दों में बयां नहीं कर पा रहा था, लेकिन मन में एक भारी बेचैनी महसूस होने लगी थी। उस हवेली के अहाते में हवा मानो थम सी गई थी, फिज़ा भारी हो चुकी थी। सबसे अहम बात यह थी कि वहाँ एक भी परिंदा नहीं था, ना ही चिड़ियों की चहचहाहट! इतने बड़े पेड़ों से घिरी पुरानी हवेली में एक भी पक्षी ना हो? पक्षियों का ना होना मुझे बहुत कुछ कह गया। मैं जानता हूँ कि इंसानों के मुकाबले जानवरों और पक्षियों को ऐसी अदृश्य, नकारात्मक ताकतों का अहसास पहले होता है। भूकंप या कोई भी आफ़त आने से पहले पालतू जानवर कैसे पिंजरे में छटपटाने लगते हैं, वैसा ही कुछ वहाँ था। मुझे समझ आ गया कि रामदुलाल बाबू कोई झूठ नहीं बोल रहे थे।”
इतने में उनके ‘कानाई’ नाम के नौकर ने हाथ-पैर धोने के लिए ठंडा पानी ला कर दिया। मैंने कपड़े बदले और हम सब बैठक में बैठ गए। रामदुलाल कलकत्ता से आते वक्त खाने-पीने का ढेर सारा सामान लाए थे। नौकर ने हमारे सामने शुद्ध घी की खस्ता लूची (पूरी), आलू की रसेदार सब्ज़ी (आलू दम), बंगाली संदेश और उम्दा मिठाइयाँ लाकर रख दीं। मुझे बड़ी ज़ोर की भूख लगी थी, इसलिए मैंने छककर खाया। आखिर में जब नौकर ने रबड़ी का बर्तन लाकर रखा, तो मैंने हाथ जोड़ लिए और कहा, “बाप रे! अब बस, इससे ज़्यादा मैं नहीं खा सकता।”
रामदुलाल बाबू हाथ जोड़कर बोले, “ठाकुर महाशय, यह तो कुछ भी नहीं है। आपके लिए यह एक मामूली सेवा है। थोड़ा और लीजिए।”
खाना खाने के बाद रामदुलाल ने हौले से पूछा, “ठाकुर, आपको कुछ महसूस हुआ क्या? क्या इस मकान में सचमुच कोई दोष है?”
मैंने असली रहस्य को छुपाते हुए कहा, “अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी। आज की रात मुझे यहाँ अनुभव करने दीजिए। फिर देखते हैं क्या होता है।”
शाम ढली और हवेली में स्याह गाढ़ा अंधेरा छा गया। हम बैठक में लालटेन की रोशनी में बैठे थे। अचानक, रात के सन्नाटे में वही रोने की आवाज़ गूंजने लगी! मेरे सामने बैठे रामदुलाल का चेहरा एक सेकेंड में खून के बिना बिल्कुल सफेद पड़ गया। वे कांपते हाथों से मुझसे बोले, “सुना… सुना ठाकुर? वही… वही आवाज़…”
अब रामदुलाल को ज़्यादा कुछ बताने की ज़रूरत नहीं थी। वह आवाज़ बेहद करुण, दिल को दहला देने वाली और आर्त सिसकियों से भरी थी। साफ समझ आ रहा था कि वह किसी जवान लड़की की, औरत की चीख थी; मानो कोई बेहद असहनीय दर्द में तड़प-तड़प कर दम तोड़ते हुए रो रहा हो। वह आवाज़ आ कहाँ से रही थी? कभी लगता कि बाहर के जंगल से आ रही है, तो दूसरे ही पल लगता कि वह बिल्कुल कमरे के भीतर से, हमारे पैरों के नीचे से आ रही है!
इतने में दरवाज़े पर शचीदुलाल आकर खड़ा हो गया। वह कांपते हुए बोला, “बाबूजी, सुना ना आपने?” नौकर कानाई भी डर के मारे कमरे में भागा चला आया, उसके हाथ में एक हैरीकेन लालटेन थी। मैंने लालटेन खुद अपने हाथ में ली और उनसे कहा, “तुम दोनों इसी कमरे में रुको। कमरे के बाहर कदम मत रखना। मैं खुद बाहर जाकर देखता हूँ।”
मैं लालटेन लेकर पूरी हवेली में घूमा। हर कमरा, अंधेरे कोने, सीढ़ियाँ सब टटोल कर देखीं। लेकिन उस रोने की आवाज़ का सटीक ठिकाना मुझे नहीं मिल रहा था। कभी लगता आवाज़ पूरब से आ रही है, तो कभी पश्चिम से। वह एक अजब मायाजाल था! मैं जब दोबारा बैठक में लौटकर आया, तो अचानक वह रोने की आवाज़ बंद हो गई। कमरे में रामदुलाल और उनका बेटा पत्थर की मूरत की तरह तख्त पर पैर ऊपर किए बैठे थे। ‘काक तालीय न्याय’ की तरह (संयोग से) मेरे कदम रखते ही वह आवाज़ थम जाने की वजह से उन दोनों को लगा कि मैंने अपनी मंत्रशक्ति से उस आवाज़ को शांत कर दिया है! रामदुलाल बोले, “ओह ठाकुर! क्या खौफनाक आवाज़ थी वह! आपने उसे कैसे शांत कर दिया? सचमुच, आपका आना हमारा बड़ा सौभाग्य है!” मैं कुछ न बोलकर खामोश रहा। उनका वह वहम दूर करने का कोई मतलब नहीं था; मुझ पर उनका यह भरोसा ही उन्हें दिमागी ताकत दे रहा था।”
रात के वक्त एक बार फिर मेरे भोजन के लिए बड़ा तामझाम किया गया। पूजा के थाल जैसे बड़े कांसे की थाली में खुशबूदार चावल का घी वाला भात, मटन का रसा, रोहू मछली का कालिया और कई तरह की मिठाइयाँ परोसी गईं। मैंने कहा, “मित्रा बाबू, यह बहुत ज़्यादा है। दोपहर में इतना खाने के बाद मैं इसे कैसे खत्म करूँगा?” पर उनकी ज़िद के आगे मुझे थोड़ा खाना ही पड़ा। इसके बाद के दो दिन मेरे लिए ऐसे ही पंचपकवानों का दौर चलता रहा।
“रात के वक्त मुझे कमरे में नींद नहीं आ रही थी। एक तो खाना बहुत भारी हो गया था और दूसरा मन में उस मकान के अमंगल साये की चिंता थी। मुझे अपने गाँव के उन महान साधु के शब्द याद आए—उन्होंने कहा था कि मेरे भीतर भविष्य में ऐसी अदृश्य ताकतों को भांपने की काबिलियत आएगी। आज उसकी सच्चाई सामने दिख रही थी।”
“अगले दिन सुबह एक बेहद अजीब और रहस्यमयी घटना घटी। यहीं से इस कहानी के असली रहस्य का आगाज़ होता है। सुबह के तकरीबन आठ बजे होंगे। मैं बैठक में बैठा था। रामदुलाल बाहर कुएं पर गए थे और शची भी गाँव में किसी काम से गया था। इस हवेली के दाहिने कोने में जमींदार ने बड़े सलीके और चाव से एक मॉडर्न ‘गुसलखाना’ (बाथरूम) बनवाया था। उसका फर्श बिल्कुल सफेद संगमरमर (मार्बल) के पत्थरों से जड़ा हुआ था और दीवारों पर छाती तक खूबसूरत नक्काशी थी। नौकर कानाई ने सुबह ही कुएं का ताज़ा पानी निकालकर वहाँ लाकर रख दिया था। रामदुलाल वहाँ स्नान कर रहे थे।”
“अचानक गुसलखाने के दरवाज़े से धड़ाम से आवाज़ हुई और रामदुलाल कमरे में भागते हुए आए! उनका चेहरा गहरे डर से विकृत हो चुका था, वे थर-थर कांप रहे थे। वे आधे अधूरे स्नान से गीले बदन, बिना बदन पोंछे भागे आए थे। मैंने पूछा, “मित्रा बाबू, क्या हुआ? इतने क्यों घबराए हुए हो?” शुरू में उनके मुंह से बोल ही नहीं फूट रहे थे। इस उजाले की सुबह उन्होंने ऐसा क्या देख लिया? मैंने उन्हें थोड़ा डपटते हुए कहा, “अरे, बताइए तो सही क्या हुआ?”
वे सिर्फ इतना ही बोले, “मेरे साथ आइए ठाकुर… खुद अपनी आँखों से देखिए!”
मैं उनके पीछे-पीछे गुसलखाने में गया। उन्होंने गुसलखाने के फर्श की तरफ उंगली से इशारा करते हुए कहा, “वह देखिए… वहाँ!”
शुरुआत में मुझे उस साफ़-सुथरे, सफेद संगमरमर के फर्श पर कुछ नज़र नहीं आया। लेकिन जब मैंने गौर से देखा, तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं! उस सफेद मार्बल के एक टुकड़े (टाइल) के अंदरूनी हिस्से में धुंधली, काले रंग की एक आकृति उभर आई थी। वह एक इंसानी चेहरे का अक्स था! ध्यान से देखने पर समझ आता था कि वह किसी युवती का, स्त्री का चेहरा था। उसके लंबे बाल फर्श की लकीरों में साफ झलक रहे थे। पर वह चेहरा सामान्य नहीं था; वह बेहद दर्द, तड़प और चीखते वक्त जैसा विकृत हो जाता है, वैसा डरावना दिख रहा था! मानो कोई उसका गला घोंट रहा हो और यह उसका आखिरी चेहरा रहा हो!”
मैंने पूछा, “मित्रा बाबू, फर्श पर यह तस्वीर किसने बनाई? और किस चीज़ से बनाई?”
रामदुलाल रोनी सूरत बनाकर बोले, “ठाकुर, मुझे कुछ नहीं मालूम! हमने जब घर खरीदा था तब यहाँ कुछ नहीं था। आज सुबह जब कानाई पानी रख रहा था और मैं खड़ा था, तब भी यहाँ फर्श साफ था। लेकिन अभी मैं नहा रहा था तो मेरे हाथ से साबुन नीचे गिर गया; उस साबुन को उठाने के लिए जब मैं नीचे झुका, तो सीधे मेरी नज़र इस चेहरे पर पड़ी! मेरी आँखें उस आकृति से सीधे टकरा गईं! यह क्या है ठाकुर? मैंने इतने चाव से यह घर लिया और यहाँ यह क्या तमाशा शुरू है?”
मैंने कहा, “आप पहले शांत हो जाइए, अपना नहाना पूरा कीजिए। मैं यहीं दरवाज़े के बाहर खड़ा हूँ, डरिए मत।” रामदुलाल ने जैसे-तैसे अपना नहाना निपटाया। एक बड़े, रसूखदार व्यापारी को ऐसी अदृश्य ताकत के सामने इतना बेबस और लाचार होते मैं पहली बार देख रहा था। कुदरत और अमानवीय शक्तियों के आगे इंसान का घमंड कैसे मिट्टी में मिल जाता है, यह उसका जीता-जागता उदाहरण था।”
“बैठक में बैठकर रामदुलाल मायूसी से बोले—’ठाकुर, जब से यह घर लिया है, तब से मेरा कारोबार भी डूबने लगा है! बाज़ार में मुझ पर बहुत कर्ज़ हो गया है। बड़ाबाज़ार के एक बड़े मारवाड़ी व्यापारी को मैंने करीब सत्तर हज़ार रुपये का कपड़े का माल सप्लाई किया था; वह मारवाड़ी अब मेरा बिल देने में टालमटोल कर रहा है। रोज़ आज-कल कहकर मुझे चक्कर कटवा रहा है। हम मारवाड़ियों से क्या मुकाबला करेंगे? मेरी ही गलती थी कि मैंने उसे इतना माल उधारी पर दे दिया। अगर मेरे वे सत्तर हज़ार रुपये डूब गए, तो मेरा धंधा पूरी तरह चौपट हो जाएगा, मैं दिवालिया हो जाऊंगा! कोर्ट-कचहरी करके पैसे वसूल करने तक मेरा व्यापार दम तोड़ चुका होगा। इधर व्यापार की चिंता और उधर इस हवेली की यह भयानक आफ़त! हम इस घर में नहीं रह सकते। मुझे अब खुदकुशी करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा ठाकुर महाशय!'”
मैंने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा, “मित्रा बाबू, रुकिए! ऐसे हिम्मत हार जाने से कैसे काम चलेगा? व्यापार में उतार-चढ़ाव, मुनाफ़ा-नुकसान, ज्वार-भाटा तो आता ही रहता है। और इस मकान के मामले में कहूँ तो—मेरे विचार से आपको इस ताकत से डरने की रत्ती भर भी ज़रूरत नहीं है।”
वे बोले, “डरने की ज़रूरत नहीं है? वह ताकत रोज़ रात को रोती है, फर्श पर उसके चेहरे उभर रहे हैं!”
मैंने समझाते हुए कहा, “ठंडे दिमाग से सोचिए। जो आत्मा या ताकत यह सब कर रही है, अगर उसका मकसद आपको नुकसान पहुँचाना या मारना होता, तो वह इतने दिनों में यह आसानी से कर सकती थी। क्या उसने आपको आज तक कोई शारीरिक तकलीफ़ दी है? नहीं! फिर वह रात को क्यों रोती है? और फर्श पर चेहरा क्यों दिखा रही है? क्योंकि वह सिर्फ हमारा ध्यान खींचने की कोशिश कर रही है! उसे हमसे कुछ कहना है, उसकी कोई अजीब मांग है।”
रामदुलाल ने पूछा, “तो अब मैं क्या करूँ?”
मैंने कहा, “आपको कुछ नहीं करना है। मैं यहाँ अभी कुछ दिन और रुकने वाला हूँ। मैं इस रहस्य की तह तक जाऊँगा। जो करना है वह मैं करूँगा।” शचीदुलाल ने भी गुसलखाने का वह चेहरा देखा; वह नौजवान होने के कारण पिता के मुकाबले थोड़ा हिम्मती था, वह डरा ज़रूर पर कुछ बोला नहीं।”
“उस रात मैंने हिफ़ाज़त के तौर पर अपनी झोली से अभिमंत्रित (सिद्ध) जल निकाला और गाँव के उन साधु द्वारा दिए गए मंत्र का जाप करते हुए पूरी हवेली के चारों तरफ ज़मीन पर छिड़क दिया, ताकि कोई भी बाहरी दुष्ट ताकत अंदर कदम न रख सके। उस रात हममें से किसी को भी ठीक से नींद नहीं आई।”
“अगले दिन सुबह हम उठकर गुसलखाने में गए, तो वह फर्श पर बनी तस्वीर कल के मुकाबले और भी साफ़ और गहरी हो चुकी थी! चेहरे के चारों तरफ की लकीरें और गाढ़ी हो गई थीं और उस युवती के चेहरे का असहनीय दर्द और यातना अब बिल्कुल साफ़ झलक रही थी। मानो उस तस्वीर के ज़रिए वह हमसे कुछ कहने की गुहार लगा रही हो। मैं आगे बढ़ा और अपने पैर से उस तस्वीर को रगड़कर मिटाने की कोशिश की; लेकिन क्या अचरज, उस सफेद संगमरमर से वह काला दाग टस से मस नहीं हुआ! वह दाग फर्श के ऊपर नहीं था, बल्कि पत्थर के अंदरूनी हिस्सों में खून की तरह समा चुका था। बाहर से कितना भी घिसा जाए, उसका निकलना नामुमकिन था।”
“उसके अगले दिन शाम को फिर से भारी उमस महसूस हो रही थी। मैंने रामदुलाल से कहा, “मित्रा बाबू, आज बहुत गर्मी है, नौकर कानाई से कहिए गुसलखाने में पानी रख दे, मैं एक बार नहा लेता हूँ।” उन्होंने पानी रखवा दिया। मैं गुसलखाने में गया और बदन पर ठंडा पानी डालने लगा। मेरे पैरों के पास ज़मीन पर उस युवती की वह विकृत तस्वीर थी। पिछले तीन-चार दिनों में हमें उस तस्वीर की आदत हो चुकी थी, इसलिए मैं उसकी तरफ बिना देखे नहा रहा था। इतने में अचानक मेरे रोंगटे खड़े हो गए—वही रोने की आवाज़ फिर शुरू हो गई!”
“लेकिन इस बार वह आवाज़ दूर दीवारों में से नहीं आ रही थी, वह बिल्कुल मेरे बगल से, उसी बंद गुसलखाने के भीतर से आ रही थी! मानो बिल्कुल मेरे पीछे खड़ी होकर वह लड़की रो रही हो! गुसलखाने में मैं पूरी तरह अकेला था, बाहर अंधेरा घिरने लगा था, पैरों के पास वह रहस्यमयी तस्वीर और हवा में एक लड़की की आर्त सिसकियों की आवाज़! बाहर से रामदुलाल दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से खटखटा रहे थे—’ठाकुर महाशय! ठाकुर महाशय! आप अंदर ठीक तो हैं ना? बाहर आइए!'”
मैंने ज़ोर से कहा, “मित्रा बाबू, मैं ठीक हूँ। डरिए मत। आप अपने कमरे में जाकर बैठिए, मैं अभी आया!”
वह आवाज़ सचमुच मेरे पैरों के नीचे से, उस संगमरमर के फर्श के नीचे से आ रही थी। मेरे दिमाग में बिजली की तरह एक तरकीब कौंधी और मुझे रहस्य की चाबी मिल गई! मैं तुरंत नहाकर बाहर आया। मैंने रामदुलाल से पूछा, “मित्रा बाबू, जब आपने जमींदार के बेटों से यह हवेली खरीदी थी, तब क्या उन्होंने आपको इस मकान के अतीत के बारे में कुछ बताया था?”
वे बोले, “नहीं, उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं बताया था। अगर बताया होता तो मैं भला यह हवेली क्यों खरीदता?”
मैंने कहा, “ठीक है। आपके कलकत्ता के किराए के घर में आपके कितने भरोसेमंद नौकर हैं?” उन्होंने बताया, “दो पुराने नौकर हैं, जो मेरे लिए अपनी जान भी दे सकते हैं।” मैंने कहा, “कल सुबह शची को कलकत्ता भेजकर उन दो हट्टे-कट्टे और वफ़ादार नौकरों को यहाँ बुला लीजिए। और कानाई को भी साथ रखिए। हमें एक बड़ा काम करना है।”
“आगे का वाकया बहुत संक्षिप्त और रहस्यमयी है। अगले दिन दोपहर के वक्त शची कलकत्ता से उन दो तंदुरुस्त नौकरों को लेकर हवेली पहुँच गया। मैं उन्हें सीधे उसी गुसलखाने में ले गया। रामदुलाल बेहद शांत और डरे-समे से किनारे खड़े थे, उन्होंने मुझसे एक भी सवाल नहीं किया। मैंने रामदुलाल से पूछा, “क्या इस हवेली में लोहे की साबल (पहार) और कुदाल मिल जाएगी?” उन्होंने नौकर के ज़रिए वे औज़ार मंगवा लिए।”
मैंने उन नौकरों को हुक्म दिया— “इस गुसलखाने का यह संगमरमर का फर्श, जिस पर यह तस्वीर उभरी है, इसे साबल की मदद से फौरन उखाड़ फेंको!”
नौकरों ने साबल का ज़ोरदार वार किया और संगमरमर की टाइलें टूटकर अलग हो गईं। उन सफेद पत्थरों के नीचे पुराने ज़माने का सुर्खी, चूना और मिट्टी का अस्तर निकला। मैंने कहा, “और नीचे खोदो, मिट्टी बाहर निकालो!” नौकरों ने दो से तीन फीट नीचे तक खुदाई की। इतने में एक नौकर की कुदाल ज़मीन के अंदर किसी सख्त चीज़ से टकराई। उसने झुककर मिट्टी हटाई और अचानक उसके मुंह से एक भयानक चीख निकल पड़ी! उसने हाथ से कुदाल फेंक दी और वह थर-थर कांपने लगा।”
रामदुलाल और हम सबने उस गड्ढे में झांककर देखा। रामदुलाल खौफ से चिल्लाए, “ठाकुर महाशय! हे ईश्वर… यह क्या है?”
उस गड्ढे में, ज़मीन के भीतर तकरीबन तीन फीट की गहराई पर एक पूरा इंसानी कंकाल दबाया गया था! वह कंकाल एक छोटे कद-काठी की, जवान लड़की का था। हम जब उस कंकाल को बाहर निकालने की कोशिश करने लगे, तो पुरानी हड्डियाँ होने की वजह से वे जोड़-जोड़ से अलग होकर बिखर गईं। कुछ ही देर में गुसलखाने के फर्श पर इंसानी हड्डियों का एक छोटा सा ढेर लग गया था!”
किशोरी ने सांस रोककर पूछा, “बाप रे! फिर आगे क्या हुआ तारानाथ बाबू?”
तारानाथ बोले, “उसके बाद क्या होना था? हमने उन तमाम हड्डियों को बड़े आदर के साथ एक कपड़े में समेटा। मैंने रामदुलाल से कहा कि इस मकान की मुक्ति का यही एकमात्र रास्ता है। हम उन हड्डियों को लेकर पवित्र गंगा नदी (हुगली नदी) के तट पर गए और वहाँ सारे धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उन हड्डियों को गंगा की पवित्र धारा में विसर्जित कर दिया। गंगा में अस्थि विसर्जन करके लौटने के बाद, उस मतीपुर की हवेली में फिर कभी, ज़िंदगी में कभी भी उस लड़की के रोने की आवाज़ सुनाई नहीं दी! गुसलखाने की वह आकृति भी हमेशा के लिए गायब हो गई।”
रामदुलाल ने मुझसे पूछा था, “ठाकुर महाशय, वह कंकाल किसका था? वह लड़की कौन थी?”
मैंने उनसे कहा, “मित्रा बाबू, इतने सालों के बाद उसकी असली पहचान कर पाना नामुमकिन है। लेकिन यह तय है कि वह इन जमींदारों के पूर्वजों में से किसी की क्रूरता का शिकार हुई थी। पुराने ज़माने के जमींदार कितने ज़ालिम, अय्याश और बेरहम हुआ करते थे, यह तो आप जानते ही हैं। उन्होंने किसी वजह से उस बेगुनाह लड़की का कत्ल करके, उसकी लाश को छुपाने के लिए अपने ही अंतःपुर (निवास) के गुसलखाने की ज़मीन के नीचे दफ़ना दिया था और ऊपर से पक्का निर्माण करवा दिया था! उसकी आत्मा अपनी मुक्ति और इंसाफ़ के लिए पिछले कई सालों से उस अंधियारे मकान में छटपटा रही थी। जमींदार के वंशज जब तक वहाँ रह रहे थे, तब तक उसकी आत्मा शायद उनसे मुक्ति की उम्मीद नहीं कर रही थी, क्योंकि वे उसके कातिलों का ही खून थे! इसलिए जब वह मकान आपके जैसे एक बेदाग और भले इंसान को बेचा गया, तो उसकी आत्मा ने अपनी मुक्ति के लिए चीख-पुकार मचाकर आपका ध्यान खींचने की कोशिश की। आपने उसकी हड्डियों को गंगा में विसर्जित करके उसे आज़ाद कर दिया; अब वह आत्मा आपको कभी परेशान नहीं करेगी, बल्कि उसकी रूह आपको दिल से दुआ देगी!”
मैंने रामदुलाल को आगे समझाया— “जिन जमींदार के लड़कों ने यह हवेली आपको बेची, उन पर गुस्सा मत कीजिए। उन्हें इस काले इतिहास की भनक तक नहीं रही होगी, क्योंकि उनके पूर्वजों ने इस जुर्म को बेहद राज़दाराना तरीके से अंजाम दिया था। कोई गवाह रखकर खून नहीं करता।”
रामदुलाल ने कहा था, “लेकिन ठाकुर, जब वे जमींदार के वंशज यहाँ रहते थे, तब क्या उन्हें कभी आवाज़ सुनाई नहीं दी होगी? उनका मुझे न बताना एक धोखा ही है।”
मैंने कहा, “मैंने अभी कहा ना, कातिलों के खानदान से उसे मुक्ति नहीं चाहिए थी, इसलिए वह खामोश रही। मकान मालिक बदलते ही उसने आपसे दया की भीख मांगी। अब यह मकान पूरी तरह शुद्ध और पवित्र हो चुका है, सुख से रहिए!”
तारानाथ अपनी बात खत्म करके मुस्कुराए और बोले, “रामदुलाल मित्रा ने मुझे बड़े आदर के साथ कलकत्ता के मेरे घर पहुँचाया और मेरे पैर छूकर पांच सौ रुपये की भारी दक्षिणा दी! बीस साल पहले पांच सौ रुपये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी दोस्तों। मैंने शुरू में मना किया, पर उन्होंने ज़िद की और बोले— ‘ठाकुर, अगर आपने अपनी सूझबूझ से वह गुसलखाना खुदवाने को न कहा होता, तो हम कभी उस रहस्य तक नहीं पहुँच पाते और वह हवेली हमेशा के लिए भूतबंगला बनी रहती। यह पांच सौ रुपये आपके चरणों की सेवा है।’ मैंने वह दक्षिणा स्वीकार कर ली।”
“उस घटना के तकरीबन दस-बारह दिन बाद रामदुलाल मित्रा एक बार फिर मेरे कलकत्ता वाले घर आए थे। इस बार उनके साथ उनके दोनों बेटे थे और उनके चेहरों पर एक बड़ी सी मुस्कान थी। मैंने पूछा, “आइए मित्रा बाबू! क्या खबर है? हवेली में सब खैरियत तो है ना?”
रामदुलाल मित्रा ने हंसते हुए जवाब दिया, “जी हाँ ठाकुर महाशय, आपकी कृपा और उस आत्मा का आशीर्वाद सचमुच रंग लाया है! गंगा में उस अस्थि विसर्जन के बाद से मकान बिल्कुल शांत हो गया है, परिवार में सुख-शांति है। और सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि— वह बड़ाबाज़ार का मारवाड़ी व्यापारी, जिसने मेरे सत्तर हज़ार रुपये अटका रखे थे, वह कल खुद चलकर मेरी दुकान पर आया और उसने मेरा पूरा बिल ब्याज समेत चुकता कर दिया है! व्यापार की मंदी एक ही रात में रफ़ूचक्कर हो गई है!”
तारानाथ ने अपनी कहानी पूरी की। रात काफी हो चुकी थी। रामदुलाल मित्रा के रूप में उनके जीवन में सत्तर हज़ार रुपये की लक्ष्मी लौट आई थी और तारानाथ के इस किस्से ने हमारी आज की इस बरसाती शाम को बेहद सार्थक और जादुई बना दिया था। हम दोनों उठे, ज्योतिषी तारानाथ से विदा ली और कलकत्ता की उस अंधियारी, भीगी सड़क पर तृप्त मन से अपने-अपने घरों की दिशा में चल पड़े।”

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